“तेरा इश्क … फिर से…

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उसे ठीक से याद नहीं। जुलाई-अगस्त का महीना रहा होगा। उस शाम बारिश बहुत हो रही थी।

देहरादून, मौसम के मामले में हमेशा से बेमिसाल रहा है। वो घाटियाँ, वो घाटियों की सर्द हवाएँ। इश्क होना पक्का कर देती हैं।

और वो तो था ही आशिक। ‘उसका’ आशिक।

हर रोज़ की तरह आज भी वह खां साहब की Cafe में,  टेबुल पर एक पुरानी Diary और एक गिलास चाय लिए, न जाने उन पहाड़ों में खोया, बैठा था।

“क्या लौंडे? आज भी नहीं लिख पा रहे?”,

खां साहब ने उस शाम की चुपी को तोड़ते हुए पुछा।
उसे अपनी साधना भंग होने का अहसास हुआ। खैर, खां साहब भले आदमी थे।

चेहरे पर हलकी सी हंसी के साथ कहा,
“नहीं Uncle, हो नहीं पा रहा। हर बार ऐसा महसूस होता है मानों कुछ कमी सी रह गई हो”
“पगला, तू उसे सिधा जा कर केह क्यों नहीं देता अपने दिल की बात”
“उसमें वो मज़ा नहीं Uncle, शब्दों की कुछ अलग बात होती है”
“अल्लाह जाने। तुम लेखक Types अलग प्रजाती के होते हो”

वो हर रोज़ अनामिका के नाम खत लिखता। हर रोज़ उस खत को बेकार कह कर, फेंक देता।

हर रोज़ उस खत में वो उसके नाम अपना प्रेम स्वीकारता, उसके साथ शहर भर के दुकानों में Pani Puri खाने की बात करता, उसके साथ रोज़ उसका हाथ पकड़ College साथ जाता, उसे Daily एक MahaLacto देने कि बात करता। लेकिन हर बार उसे अपना खत कमज़ोर सा लगता।

“दम नहीं लग रहा इसमें, ये प्रेम पत्र कम और चाची के घर का किराने कि List ज्यादा लग रहा”

वो इन खयालों में खोया ही था की अचानक café में अनामिका अपने दोस्तों के साथ आ पहुँची।

“ये वही College Magazine वाला है न?” उसकी एक दोस्त ने पुछा
“हाँ, शायद” अनामिका ने जवाब दिया
“देख लगता है अभी भी कुछ लिख रहा है, क्या लगता है, क्या लिख रहा होगा?”
“पता नहीं यार, अजीब बंदा है, बड़ा Revolutionary टाइप का , जब देखो तब आंदोलन की बातें ही लिखता है। लिख रहा होगा अभी भी वही घिसी पीटी सरकार और देश सेवा कि बातें” अनामिका ने जवाब दिया।

दूर खड़ा उस café का वो बूड़ा मालिक, यह सब देख मन ही मन मुसकुरा रहा था।  ❤ ❤

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